जीवन की डाली से, सूखे पत्तों की तरह, झड़़ जाते हैं झूठे रिश्ते नाते। जीवन की डाली से, सूखे पत्तों की तरह, झड़़ जाते हैं झूठे रिश्ते नाते।
क्योंकि हमें तो यहां आना ही था यही सोचकर इस मन को कई बार बहलाया है। क्योंकि हमें तो यहां आना ही था यही सोचकर इस मन को कई बार बहलाया है।
एक हद तक तो ठीक है ये सब मगर इसके सकरात्मक पहलू से ज्यादा नकरात्मक पहलू है एक हद तक तो ठीक है ये सब मगर इसके सकरात्मक पहलू से ज्यादा नकरात्मक पहलू ...
दूसरों के लिए त्याग ना कर पायी तो समाज के लिए बस एक दाग़ है तू दूसरों के लिए त्याग ना कर पायी तो समाज के लिए बस एक दाग़ है तू
सब कहते हैं तो शायद मैं सोती ही रहती हूँ मैं किसी से कुछ नहीं कहती हूँ सब कहते हैं तो शायद मैं सोती ही रहती हूँ मैं किसी से कुछ नहीं कहती हूँ
पैसे की कमी नहीं, इस रोजगार में स्कोप भी बहुत है, इस नये बाजार में। तो क्यूं ना मैं ऐ पैसे की कमी नहीं, इस रोजगार में स्कोप भी बहुत है, इस नये बाजार में। तो क्य...